Sattvayu Vaichariki
त्रिफला — केवल तीन द्रव्यों का नाम नहीं
आयुर्वेद में कुछ योग ऐसे हैं जिनका नाम सुनते ही उनके घटक द्रव्य हमारे मन में उपस्थित हो जाते हैं। त्रिफला भी ऐसा ही एक प्रसिद्ध योग है। सामान्यतः इसका नाम आते ही अभया, बिभीतक और आमलकी—इन तीन द्रव्यों का स्मरण होता है।
परन्तु प्रमेह के संदर्भ में उपलब्ध इस प्राचीन अध्ययन को पढ़ते समय त्रिफला को केवल “तीन द्रव्यों का योग” मानकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं लगता। यहाँ विचार का विषय केवल यह नहीं है कि त्रिफला में कौन-कौन से द्रव्य हैं, बल्कि यह भी है कि इन द्रव्यों को किस अनुपात में लिया गया है और उस योग को किस प्रयोजन से देखा गया है।
स्रोत में त्रिफला का एक विशिष्ट अनुपात दिया गया है— अभया — १ भाग, बिभीतक — २ भाग, आमलकी — ४ भाग।
और इसी विशेष संयोजन को मेहघ्न प्रयोजन के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
यहीं से एक महत्वपूर्ण चिकित्सकीय विचार सामने आता है।
यदि किसी योग में तीन द्रव्य हैं, तो क्या केवल तीनों द्रव्यों का नाम जान लेना उस योग का सम्पूर्ण ज्ञान माना जा सकता है?
शायद नहीं।
अभया — मेदोध्न से मेहघ्न योग तक
स्रोत में अभया को मेदोध्न कहा गया है। साथ ही यह भी उल्लेख मिलता है कि एक संदर्भ में उसे स्पष्ट रूप से मेहघ्न नहीं कहा गया है। इसके बाद त्रिफला के उपर्युक्त विशिष्ट अनुपात का उल्लेख किया गया है और उसे मेहघ्न रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह क्रम अपने आप में विचारणीय है।
एक ओर एक द्रव्य के गुण का उल्लेख है—मेदोध्न। दूसरी ओर उसी द्रव्य को अन्य द्रव्यों के साथ एक विशिष्ट योग में रखकर मेहघ्न प्रयोजन की चर्चा की गई है।
इससे हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा में किसी द्रव्य के एक गुण को देखकर उसके प्रत्येक चिकित्सकीय प्रयोग का निर्णय नहीं किया जा सकता। द्रव्य का प्रयोग उसके योग, मात्रा और प्रयोजन के संदर्भ में समझना पड़ता है।
बिभीतक और आमलकी का स्थान
त्रिफला के इस वर्णन में बिभीतक और आमलकी भी उसी विशिष्ट अनुपात का भाग हैं। यहाँ आमलकी का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इसी स्रोत के पूर्ववर्ती भाग में आमलकी के विभिन्न प्रकारों और उनके रस-प्रधान स्वरूप के बीच भेद की चर्चा की गई है। महाराष्ट्र की आमलकी को कषाय-प्रधान बताया गया है और प्रमेह में उसके उपयोग की ओर संकेत किया गया है, जबकि मांसप्रधान आमलकी को वृष्य तथा रसायन प्रयोजन से उपयोग करने की बात कही गई है।
इस प्रकार, उसी लेख के भीतर आमलकी के दो अलग-अलग संदर्भ सामने आते हैं—एक ओर द्रव्य का अपना स्वरूप और प्रयोजन, और दूसरी ओर त्रिफला जैसे योग में उसका स्थान।
यहीं से आयुर्वेदिक द्रव्य-चिन्तन की सूक्ष्मता दिखाई देती है।
द्रव्य को केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके स्वरूप और चिकित्सकीय प्रयोजन से देखना आवश्यक है।
१ : २ : ४ — केवल संख्या नहीं
त्रिफला के इस स्रोत-वर्णित रूप में अनुपात है— अभया : बिभीतक : आमलकी = १ : २ : ४
यदि हम इसे केवल एक गणितीय अनुपात के रूप में देखें, तो इसका अर्थ केवल मात्रा का अंतर रह जाएगा। लेकिन चिकित्सकीय संदर्भ में यह अनुपात स्वयं एक प्रश्न उत्पन्न करता है—क्या योग में द्रव्यों की मात्रा भी उसके प्रयोजन का एक अंग है?
स्रोत में इस विशिष्ट अनुपात को मेहघ्न प्रयोजन से जोड़ा गया है। अतः यहाँ अनुपात को केवल बनाने की विधि की सूचना न मानकर, स्रोत के चिकित्सकीय वर्णन का एक आवश्यक भाग समझना चाहिए।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति केवल यह कहे कि—“त्रिफला में अभया, बिभीतक और आमलकी होते हैं,” तो वह त्रिफला के नाम को तो जानता है, लेकिन इस स्रोत में वर्णित प्रमेह-संदर्भित योग-विचार को अभी पूरा नहीं समझता।
क्योंकि यहाँ प्रश्न केवल क्या है का नहीं है। यहाँ प्रश्न है— कितना है? और किस प्रयोजन से है?
त्रिफला और मेहघ्न विचार
स्रोत में त्रिफला के अतिरिक्त कुछ अन्य मेहघ्न समूहों का भी संकेत मिलता है। वहीं निशा का भी अन्य मेहघ्न समूहों के संदर्भ में उल्लेख किया गया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि स्रोत का उद्देश्य केवल त्रिफला का सामान्य परिचय देना नहीं है। उसका विचार-विन्यास प्रमेह में प्रयुक्त द्रव्यों और योगों के विशिष्ट चयन की ओर है।
अर्थात् त्रिफला का उल्लेख एक बड़े चिकित्सकीय प्रश्न के भीतर आता है—प्रमेह में कौन-सा द्रव्य किस आधार पर मेहघ्न माना गया है और उसका प्रयोग किस रूप में किया गया है?
यही कारण है कि अभया के मेदोध्न स्वरूप का उल्लेख और उसके बाद त्रिफला के मेहघ्न योग का उल्लेख एक साथ पढ़ना अधिक अर्थपूर्ण हो जाता है।
एक द्रव्य और एक योग में अंतर
आयुर्वेद के विद्यार्थी के लिए यहाँ एक अत्यंत उपयोगी चिंतन-बिंदु है।
द्रव्य-गुण का ज्ञान और योग का ज्ञान एक ही बात नहीं हैं।
एक द्रव्य का कोई विशेष गुण हो सकता है। लेकिन जब वही द्रव्य अन्य द्रव्यों के साथ एक निश्चित अनुपात में प्रयुक्त होता है, तब उसका चिकित्सकीय संदर्भ उस योग के भीतर समझा जाता है।
इस स्रोत में अभया का मेदोध्न वर्णन और त्रिफला का मेहघ्न वर्णन इसी अंतर को विचार के सामने लाता है।
इसलिए आयुर्वेद में औषधि का प्रश्न केवल इतना नहीं है—“यह द्रव्य किस रोग में दिया जाता है?” बल्कि उससे पहले यह भी देखना पड़ता है—“यह द्रव्य किस रूप में, किस योग में, किस मात्रा में और किस प्रयोजन से वर्णित है?”
प्रमेह के संदर्भ में त्रिफला का महत्व
इस स्रोत की दृष्टि से त्रिफला का महत्व इसी कारण केवल एक प्रसिद्ध योग होने तक सीमित नहीं रहता।
यहाँ त्रिफला—अभया, बिभीतक और आमलकी से निर्मित योग है; एक विशिष्ट १ : २ : ४ अनुपात में वर्णित है; और मेहघ्न प्रयोजन से जोड़ा गया है।
इस प्रकार त्रिफला का यह उल्लेख हमें एक महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक सिद्धान्त की ओर पुनः ले जाता है—औषधि का ज्ञान केवल द्रव्य के नाम का ज्ञान नहीं है।
द्रव्य के स्वरूप को जानना है। उसके गुण को समझना है। उसके योग को देखना है। उसकी मात्रा को समझना है। और सबसे महत्वपूर्ण—उसके प्रयोजन को पहचानना है।
एक छोटी-सी वैचारिकी
आज जब हम किसी औषधि के बारे में सुनते हैं, तो सहज ही पूछते हैं—“यह किस रोग में काम आती है?”
आयुर्वेद शायद हमें इसके साथ एक और प्रश्न जोड़ने के लिए प्रेरित करता है—“किस रूप में?”
क्योंकि एक ही द्रव्य का चिकित्सकीय अर्थ उसके संदर्भ से बदलकर अधिक स्पष्ट हो सकता है।
प्रमेह के संदर्भ में त्रिफला का यह वर्णन हमें यही सावधानी सिखाता है। अभया को केवल अकेले देखकर नहीं, बिभीतक और आमलकी के साथ उसके विशिष्ट अनुपात में देखकर समझना है। और इस योग को केवल सामान्य त्रिफला के रूप में नहीं, बल्कि स्रोत में वर्णित मेहघ्न प्रयोजन के संदर्भ में पढ़ना है।
अन्ततः प्रश्न फिर वही रह जाता है—क्या हम औषधि को केवल पहचानते हैं, या उसके प्रयोजन को भी समझते हैं?
शायद यहीं से द्रव्य-ज्ञान, योग-ज्ञान और चिकित्सकीय युक्ति के बीच का संबंध दिखाई देना आरम्भ होता है।
और यही है— सत्त्वायु वैचारिकी।
— Vaidya Alka Gupta, Satvayu Ayurveda